सूरज से पहले, चाँद से पहले, पहले तारे से भी पहले, कुछ भी नहीं था।

न दिन था, न रात। न पैरों के नीचे धरती थी, न ऊपर आसमान। न कोई आवाज़ थी, न रोशनी, और अंधेरा भी नहीं, क्योंकि अंधेरे के लिए भी रोशनी का न होना ज़रूरी है। समय भी नहीं था, इसलिए न कुछ शुरू हो सकता था और न कुछ खत्म।

फिर भी, उस सन्नाटे में कोई था।

पुराने ऋषियों ने इसे शब्दों में कहने की बहुत कोशिश की। श्वेताश्वतर उपनिषद इसे एक ही पंक्ति में कहता है:

यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः ।

yadā ’tamas tan na divā na rātrir na san na cāsac chiva eva kevalaḥ

“जब न अंधेरा था, न दिन था, न रात थी, न कुछ था और न कुछ नहीं था, तब केवल शिव थे, अकेले।”

केवल शिव। कोई भगवान नहीं जो किसी खाली जगह में बैठे हों, क्योंकि तब कोई जगह ही नहीं थी। बस वे थे। शुद्ध चेतना, जिसका न कोई आकार था, न नाम, और न उनके सिवा कोई दूसरा। उनका कोई आरंभ नहीं था, क्योंकि उनसे पहले कोई “पहले” था ही नहीं। उन्हें किसी ने नहीं बनाया। वे बस थे।

फिर, उस अनंत शांति में, एक इच्छा जागी।

शिव पुराण कहता है कि निराकार ने अनेक होने की इच्छा की। तब पहली बार उन्होंने एक रूप लिया। पुराण इस पहले रूप को सदाशिव कहता है, जो सदा मंगलमय हैं। और उनके साथ प्रकट हुईं उनकी अपनी शक्ति, सबकी माँ, जिन्हें पुराण अंबिका कहता है। शिव और शक्ति कभी सच में दो नहीं थे। जैसे आग और उसकी गर्मी, एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता।

फिर, पुराण कहता है, शिव से एक तेजस्वी रूप प्रकट हुआ। वे शांत थे, बादल की तरह साँवले, और उनकी आँखें कमल जैसी थीं। शिव ने उनका नाम विष्णु रखा और उन्हें एक काम दिया: जो कुछ भी आगे बनेगा, उसकी रक्षा करना।

विष्णु बहुत लंबे समय तक गहरे तप में बैठे रहे। उनके तप से जल बहने लगा, और उसने पूरे अनंत स्थान को भर दिया। थककर विष्णु उस जल पर लेट गए और सो गए। इसीलिए उनका एक नाम नारायण है, जो जल पर विश्राम करते हैं।

जब वे सो रहे थे, तब उनकी नाभि से एक कमल निकला और जल के ऊपर उठ आया। उस कमल पर एक नए जीव ने आँखें खोलीं। उनके चार मुख थे, जो चारों दिशाओं में देखते थे, और हर दिशा में उन्हें सिर्फ़ पानी दिखा।

ये थे ब्रह्मा।

ब्रह्मा नहीं जानते थे कि वे कौन हैं या कहाँ से आए हैं। वे युगों तक कमल की डंडी से नीचे उतरते रहे, उसकी जड़ ढूँढते रहे, पर जड़ कभी नहीं मिली। उलझन में वे वापस ऊपर आए। और वहीं, जल पर, उनकी मुलाकात विष्णु से हुई।

“आप कौन हैं?” ब्रह्मा ने पूछा।

विष्णु मुस्कुराए। “मैं वह हूँ जिससे तुम आए हो। तुम्हारा कमल मुझसे ही निकला है।”

ब्रह्मा को यह जवाब बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। “मैं सृष्टिकर्ता हूँ,” उन्होंने कहा। “सब कुछ मुझसे बनेगा। मैं सबसे बड़ा हूँ।”

“नहीं,” विष्णु ने कहा। “मैं हूँ।”

उनकी बातें और तेज़ और गरम होती गईं। पूरी सृष्टि की दो सबसे बड़ी शक्तियाँ, और दोनों को पक्का यकीन था कि वही पहले आए हैं।

और तभी, ठीक उन दोनों के बीच, अंधेरा फट गया।

कहीं से आग का एक खंभा ऊपर उठा। वह इतना तेज़ था कि दोनों को अपनी आँखें ढकनी पड़ीं। उसका न कोई ऊपरी सिरा दिखता था, न निचला। वह हर ऊँचाई से ऊपर और हर गहराई से नीचे तक जाता था, एक ऐसी रोशनी से जलता हुआ जो कभी टिमटिमाती नहीं थी।

दोनों देव चुप हो गए।

“जो इस खंभे का अंत ढूँढ लेगा,” उन्होंने तय किया, “वही बड़ा है।”

ब्रह्मा हंस बनकर ऊपर उड़े। विष्णु एक विशाल वराह बनकर नीचे खोदने लगे। वे चलते रहे, ऐसा लगा जैसे हज़ारों साल बीत गए।

विष्णु गहरे और गहरे गए, और खंभा चलता रहा। आखिर वे रुक गए। थके हुए और विनम्र होकर वे वापस ऊपर आए और बस इतना कहा, “मुझे इसका अंत नहीं मिला।”

ब्रह्मा ऊँचे और ऊँचे उड़े, और वहाँ भी खंभा चलता रहा। रास्ते में उन्होंने ऊपर से नीचे गिरता हुआ केतकी का एक छोटा-सा फूल देखा।

“तुम कहाँ से आ रहे हो?” उन्होंने पूछा।

“इस खंभे के ऊपर से,” फूल ने कहा। “मैं युगों से गिर रहा हूँ।”

ब्रह्मा को एक उपाय सूझा। उन्होंने फूल से कहा कि वह बोल दे कि ब्रह्मा ऊपर तक पहुँच गए थे। फूल मान गया।

ब्रह्मा नीचे लौटे और घोषणा की, “मैंने खंभे का ऊपरी सिरा देख लिया है। यह फूल मेरा गवाह है।”

उसी पल खंभा खुल गया, और आग में से शिव बाहर आए।

उन्होंने विष्णु की ओर देखा, जिन्होंने सच बोला था, और उन्हें आशीर्वाद दिया और सम्मान दिया। फिर वे ब्रह्मा की ओर मुड़े। शिव ने कहा कि ब्रह्मा ने झूठ बोला है, इसलिए मंदिरों में उनकी पूजा वैसे नहीं होगी जैसे दूसरे देवताओं की होगी। और केतकी का फूल, जिसने उनके साथ झूठ बोला, फिर कभी शिव को नहीं चढ़ाया जाएगा। आज भी शिव पूजा में केतकी का फूल बहुत कम दिखता है।

फिर शिव ने उन्हें खंभे का सच बताया। वह सच में खंभा नहीं था। वह वे खुद थे। विष्णु उसकी शुरुआत तक नहीं पहुँच पाए और ब्रह्मा उसके अंत तक नहीं, क्योंकि वे हर शुरुआत से पहले थे और हर अंत के बाद भी रहेंगे। उन्होंने कहा कि उस दिन से उनकी पूजा इसी रूप में होगी, लिंग के रूप में, जिसका अर्थ है “चिह्न”। उस भगवान का चिह्न जिसका कोई आकार नहीं।

शिव पुराण कहता है कि शिवलिंग की पूजा इसी तरह शुरू हुई। कई भक्त इसे पवित्र शिवरात्रि के पीछे की कथा के रूप में भी याद करते हैं।

तो, शिव कौन हैं?

वे वह हैं जो तब भी थे जब कुछ नहीं था। वे वह रोशनी हैं जिसके ऊपर ब्रह्मा उड़ नहीं सके और जिसके नीचे विष्णु खोद नहीं सके। वे पहली आवाज़ से पहले की शांति हैं, और आखिरी आवाज़ के बाद की शांति भी।

इन कथाओं में आप शिव के जितने भी रूप देखेंगे, कैलाश के योगी, पार्वती के पति, गणेश के पिता, नर्तक, धनुर्धर, वे सब उसी अनंत रोशनी के रूप हैं, जो कुछ समय के लिए एक आकार ले लेती है।

तो अगली बार जब आप शिवलिंग पर जल चढ़ाएँ, तो याद रखिए कि वह असल में क्या है। सिर्फ़ एक पत्थर नहीं। आग के उसी खंभे का एक छोटा-सा हिस्सा, जिसका न ऊपरी सिरा है, न निचला।

लेकिन कथा यहीं खत्म नहीं होती। अब विनम्र हो चुके ब्रह्मा को पूरी दुनिया बनानी थी, और वे नहीं जानते थे कि शुरुआत कैसे करें। उन्होंने हाथ जोड़कर शिव से मदद माँगी। शिव ने वचन दिया कि वे फिर से उनके पास आएँगे, खुद ब्रह्मा के भीतर से, एक उग्र नए रूप में।

वह रूप रुद्र कहलाएगा।


शिव कथाएँ में आगे: शिव रुद्र के रूप में संसार में कैसे आए।

अब आपकी बारी: जब आप शिवलिंग के सामने खड़े होते हैं, तो आपको कैसा महसूस होता है? कमेंट में हमें बताइए।

इस कथा के स्रोत: श्वेताश्वतर उपनिषद 4.18; शिव पुराण, रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) और विद्येश्वर संहिता; लिंग पुराण, पूर्व भाग। यह कथा वैसी है जैसी शैव ग्रंथ बताते हैं। कुछ दूसरे पुराण, जैसे विष्णु पुराण, सृष्टि की शुरुआत विष्णु से बताते हैं।