ब्रह्मा अपने कमल पर अकेले बैठे थे।
आग का खंभा जा चुका था। विष्णु फिर से पानी पर सो रहे थे। ब्रह्मा को पूरी दुनिया बनानी थी, लेकिन उन्हें पता नहीं था कि शुरुआत कैसे करें।
इसलिए उन्होंने आँखें बंद कीं और सोचना शुरू किया।
उनके विचारों से चार बालक प्रकट हुए। उनके नाम थे सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार।
ब्रह्मा खुश हुए। उन्होंने कहा, “मेरे पुत्रों, मेरी मदद करो। जाओ और दुनिया को जीवन से भर दो।”
लेकिन चारों बालकों ने मना कर दिया। “पिताजी, हम कुछ भी बनाना नहीं चाहते। हम सिर्फ़ भगवान का ध्यान करना चाहते हैं।” और वे चले गए।

ब्रह्मा ने बार-बार कोशिश की, लेकिन उनकी बनाई कोई भी चीज़ आगे नहीं बढ़ी। दुनिया खाली ही रही।
ब्रह्मा परेशान हो गए। फिर उन्हें गुस्सा आया। उनकी आँखों में आँसू आ गए। वे सृष्टि के रचयिता थे, लेकिन कुछ भी रच नहीं पा रहे थे।
तब उन्हें शिव का वचन याद आया। शिव ने कहा था कि वे फिर आएँगे, ब्रह्मा के भीतर से।
इसलिए ब्रह्मा शांति से बैठ गए और शिव से प्रार्थना करने लगे।
अचानक ब्रह्मा की भौंहों के बीच से एक रोशनी निकली। उनके सामने एक छोटा बालक प्रकट हुआ। उसका शरीर नीला और लाल था। इसी वजह से पुराने ग्रंथ उसे नीललोहित कहते हैं, जिसका अर्थ है “नीला और लाल”।

बालक ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था।
ब्रह्मा ने पूछा, “बच्चे, तुम क्यों रो रहे हो?”
बालक ने कहा, “क्योंकि मेरा कोई नाम नहीं है। कृपया मुझे एक नाम दीजिए।”
ब्रह्मा ने कहा, “तुम रोते हुए आए हो, इसलिए तुम्हारा नाम रुद्र होगा। इसका अर्थ है, जो रोता है।”
लेकिन बालक रोता रहा। तो ब्रह्मा ने उसे एक और नाम दिया, फिर एक और। अंत में बालक के आठ नाम हो गए:
- रुद्र, जो रोता है।
- भव, जो हर चीज़ में है।
- शर्व, धनुर्धर।
- ईशान, स्वामी।
- पशुपति, सभी जीवों के स्वामी।
- भीम, जो देखने में डरावने हैं।
- उग्र, जो प्रचंड हैं।
- महादेव, महान देव।
आठों नाम मिलने के बाद बालक ने रोना बंद कर दिया।
ब्रह्मा समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। यह स्वयं शिव थे। उन्होंने अपना वचन निभाया था और ब्रह्मा के भीतर से, ब्रह्मा के गुस्से से, प्रकट हुए थे।

इसीलिए रुद्र की प्रसिद्ध वैदिक प्रार्थना, श्री रुद्रम, सबसे पहले उनके क्रोध को प्रणाम करती है:
नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नमः ।
नमस्ते अस्तु धन्वने बाहुभ्यामुत ते नमः ॥namaste rudra manyava uto ta iṣave namaḥ | namaste astu dhanvane bāhubhyām uta te namaḥ ||
“हे रुद्र, आपके क्रोध को प्रणाम, और आपके बाण को प्रणाम। आपके धनुष को प्रणाम, और आपकी दोनों भुजाओं को प्रणाम।”
ब्रह्मा ने हाथ जोड़कर कहा, “महादेव, कृपया दुनिया बनाने में मेरी मदद कीजिए।”
रुद्र मान गए। उन्होंने आँखें बंद कीं, और नए जीव प्रकट होने लगे।
लेकिन वे सब बिल्कुल रुद्र जैसे दिखते थे। उनकी जटाएँ थीं, तीन आँखें थीं और नीले कंठ थे। उनके हाथों में त्रिशूल थे। और उनमें से कोई भी कभी बूढ़ा नहीं होता, न कभी मरता। जल्दी ही वे हज़ारों की संख्या में हो गए।
ब्रह्मा चिंतित हो गए। उन्होंने कहा, “कृपया रुकिए। ये जीव कभी नहीं मरेंगे। मेरी दुनिया को ऐसे जीव चाहिए जो जन्म लें, बड़े हों, और एक दिन मर जाएँ। कृपया ऐसे जीव बनाइए।”
रुद्र ने कहा, “यह मेरा काम नहीं है। मैं ऐसे जीव नहीं बनाता जो बूढ़े हों और मरें। उन्हें आप बनाइए। मैं सृष्टि से दूर रहूँगा।”
फिर रुद्र बिल्कुल स्थिर खड़े हो गए और गहरे ध्यान में चले गए। इसी वजह से उन्हें स्थाणु भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “जो स्थिर खड़ा रहता है”।
दुनिया की शुरुआत से ही यह हमें दिखाता है कि शिव कौन हैं। वे चीज़ें नहीं बनाते। वे जन्म और मृत्यु से परे रहते हैं, शांत और स्थिर।

ब्रह्मा ने उन्हें प्रणाम किया और फिर से काम में लग गए। उन्होंने आकाश, धरती, समुद्र और पहले जीव बनाए। ये जीव जन्म लेते थे और मरते थे, जैसा ब्रह्मा चाहते थे।
लेकिन अब भी एक समस्या थी। उनके जीव अपने आप बच्चे पैदा नहीं कर सकते थे। ब्रह्मा को हर एक जीव खुद बनाना पड़ता था। दुनिया बहुत धीरे-धीरे बढ़ रही थी।
इसलिए ब्रह्मा ने एक बार फिर शिव से प्रार्थना की।
इस बार शिव एक नए रूप में आए। उनका आधा शरीर पुरुष का था, और आधा शरीर स्त्री का।
शिव कथाएँ में आगे: अर्धनारीश्वर, वह भगवान जो आधे स्त्री हैं।
अब आपकी बारी: क्या आप जानते थे कि रुद्र को उनका पहला नाम रोने की वजह से मिला था? उनके आठ नामों में से आपको कौन-सा नाम सबसे अच्छा लगता है? कमेंट में हमें बताइए।
इस कथा के स्रोत: शिव पुराण, रुद्र संहिता (सृष्टि खंड) और शतरुद्र संहिता; विष्णु पुराण, प्रथम अंश; लिंग पुराण, पूर्व भाग; श्री रुद्रम (तैत्तिरीय संहिता 4.5.1)। अलग-अलग पुराण यह कथा थोड़े अलग तरीके से बताते हैं। कुछ कहते हैं कि रुद्र ब्रह्मा के माथे से प्रकट हुए, कुछ कहते हैं उनके क्रोध से, और विष्णु पुराण कहता है कि रोता हुआ बालक ब्रह्मा की गोद में प्रकट हुआ। यह कथा पहली कथा की तरह शैव ग्रंथों के अनुसार है।