परंपरागत रूप से शिव की छवियों में उनकी जटाओं में एक छोटा सा अर्धचंद्र दर्शाया जाता है।
यह अर्धचंद्र कोई साधारण अलंकरण नहीं है। अलंकरण आते-जाते रहते हैं; चंद्रमा नहीं। यह चंद्रमा परिवर्तन, चक्र और सृष्टि की क्षणभंगुरता का प्रतीक है।
चंद्र की कथा
एक प्रचलित कथा के अनुसार शिव स्वयं चंद्र (चंद्रमा) के अधिपति हैं।
चंद्र का विवाह दक्ष की अनेक पुत्रियों से हुआ था, परंतु जब चंद्र केवल एक पुत्री रोहिणी पर ही विशेष स्नेह रखने लगे, तो दक्ष क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने चंद्र को शाप दे दिया।
कथा आगे बढ़ती है — चंद्र ने शिव की शरण ली। शिव ने कृपापूर्वक चंद्र को अपनी जटाओं में स्थान दिया और उन्हें चक्रों में घटने-बढ़ने की शक्ति प्रदान की।
रोहिणी, चंद्रमा की पत्नी के रूप में, पूर्णिमा को जन्म देती हैं। ये चक्र समय के प्रवाह के प्रतीक हैं।
शिव और महाकाल
शिव का महाकाल से भी गहरा संबंध है। इसीलिए यह समझा जा सकता है कि शिव को अर्धचंद्र सहित क्यों दर्शाया जाता है। यह चंद्रमा उस हर वस्तु का प्रतीक है जो दृश्य है और निरंतर बदलती रहती है, जबकि शिव स्वयं स्थिरता के प्रतीक हैं।
शिव की छवि में अर्धचंद्र कोई संयोग नहीं है। अगली बार जब आप शिव की छवि देखें, तो इसे ध्यान से देखिए।
यह समय के प्रवाह को दर्शाता है और परिवर्तन तथा चक्रों की याद दिलाता है। यही कारण है कि यह प्रतीक आज भी उतना ही प्रासंगिक है।